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विपक्ष पस्त सरकार मस्त

 बीसवीं सदी राजतंत्र के लिए अंत बनकर आयी ओर पूरे विश्व में एक नई व्यवस्था में जन्म लिया। इस व्यवस्था में अधिकार एक व्यक्ति के पास न होकर एक समूह के पास चला गया, ओर ये समूह उस देश या सूबे का भविष्य तय करने का अधिकारी था जिसे आम भाषा में सरकार कहा गया । किन्तु इस बार खूबसूरती यह थी कि इस समूह की देखरेख व कामकाज की समीक्षा हेतु विपक्ष के रूप में एक अन्य समूह बना। जनता की बात, सरकार तक ओर सरकार की गतविधियों की समीक्षा कर जनता तक पंहुचा ने, सरकार पर अंकुश लगाने को दायित्व विपक्ष पर ही था। बीसवीं सदी के मध्य में स्वतंत्र हुए भारत ने भी यही प्रथा अपनाई, पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे विशाल व्यक्तित्व के सामने, संसद में भले विपक्ष का विधिपूर्वक नेता नहीं था। किन्तु उनकी नीतियों की समीक्षा हेतु पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय जी, प्रो के. टी. शाह, अटल बिहारी बाजपेई, रामधारी सिंह दिनकर एवम् अन्य विभूतियां मौजूद थीं जिन्होंने पंडित जी की हर एक नीति की समीक्षा परिस्थिति अनुसार की।         1969 इंदिरा गांधी कार्यकाल में विपक्ष का पहला अधिमान्य नेता कांग्रेस के...