विपक्ष पस्त सरकार मस्त

 बीसवीं सदी राजतंत्र के लिए अंत बनकर आयी ओर पूरे विश्व में एक नई व्यवस्था में जन्म लिया। इस व्यवस्था में अधिकार एक व्यक्ति के पास न होकर एक समूह के पास चला गया, ओर ये समूह उस देश या सूबे का भविष्य तय करने का अधिकारी था जिसे आम भाषा में सरकार कहा गया । किन्तु इस बार खूबसूरती यह थी कि इस समूह की देखरेख व कामकाज की समीक्षा हेतु विपक्ष के रूप में एक अन्य समूह बना। जनता की बात, सरकार तक ओर सरकार की गतविधियों की समीक्षा कर जनता तक पंहुचा ने, सरकार पर अंकुश लगाने को दायित्व विपक्ष पर ही था। बीसवीं सदी के मध्य में स्वतंत्र हुए भारत ने भी यही प्रथा अपनाई, पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे विशाल व्यक्तित्व के सामने, संसद में भले विपक्ष का विधिपूर्वक नेता नहीं था। किन्तु उनकी नीतियों की समीक्षा हेतु पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय जी, प्रो के. टी. शाह, अटल बिहारी बाजपेई, रामधारी सिंह दिनकर एवम् अन्य विभूतियां मौजूद थीं जिन्होंने पंडित जी की हर एक नीति की समीक्षा परिस्थिति अनुसार की। 

       1969 इंदिरा गांधी कार्यकाल में विपक्ष का पहला अधिमान्य नेता कांग्रेस के है दूसरे धड़े ने दिया । फिर 1970 से 1977 तक कोई विपक्ष का मजबूत नेता नहीं रहा और विपक्ष भी इंदिरा गांधी के सख्त व्यक्तित्व के आगे विखर गया था जिसने 1975 में इंदिरा गांधी को स्वाभिमानी नेता से निरंकुश शासक बना दिया किन्तु जब सत्ता के नशा की अति हो गई तब मगध की भूमि से फिर एक समाजसेवी उठा और जनता की भावनाओं को अपने नेतृत्व से सिंचित कर दंभित सरकार को उखाड़ कर सत्ता नए शासक को सौंपकर वापस चला गया मगर असंगठित दल सत्ता संभाल नहीं पाए और सत्ता वापस चली गई लेकिन इस बात का अहसास हर एक स्वयंभू को कराया कि जनता किसी को भी कभी भी उसकी हैसियत दिखा सकती है । फिर राजीव गांधी सरकार में विपक्ष का अधिमान्य नेता नहीं रहा ओर राजीव की सरकार पर भी निरंकुशता के आरोप लगे । 1990 से 2014 तक लगातार गठबंधन की सरकारें बनी ओर एक मजबूत विपक्ष संसद में रहा किन्तु अब विपक्ष समीक्षा की जगह आलोचना की भूमिका में आ गया जो की लोकतंत्र के लिए स्वस्थकारी नहीं है। 2014 में नरेंद्र दामोदर दास मोदी एक आंधी की तरह सत्ता पर विराजमान हुए ओर विपक्ष के नाम पर स्वयं के अस्तित्व से जूझती, एक परिवार के साए में दम घुटती कांग्रेस पार्टी है जो कि चमकदार प्रायोजित और निरंकुशता की ओर अग्रसर सत्ताधारी पार्टी का मुकाबला करने में असमर्थ है । आज फिर से जरूरी है कि कोई जे पी या अन्ना जी की तरह समाज में से उठकर आए और सरकार  को एहसास दिलाए कि संसद में विपक्ष की नामोजुदगी सरकार को मनमानी करने का लाइसेंस नहीं देदेती। जनता सरकार से प्रश्न करने नीतियों की समीक्षा करने मोजूद है। फिर एक नचिकेता यमराज से उत्तर जानने को भिड़ जाएगा । दंभ भरती सरकार को एहसास दिलाएगा की सरकार जनता के द्वारा बनाई जाती है तो गिराई भी जा सकती है । जैसे किसान बिल के विरोध में दिल्ली में जुटी भीड़ भी सरकार को एहसास दिला रही कि सदस्य संख्या/बहुमत के मद में फूली सरकार याद रखे कि सदन में भले ही कोई भी विधेयक पास करा ले किन्तु जब तक जनता की मंशा के अनुरूप नहीं होगा, उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरेगा तब तक वो सरकार शांति से शासन नहीं कर सकती । भले सदन में विपक्ष ना हो, किन्तु जनता चिरंतन विपक्ष है । 

               "मत भूल की तेरा वजूद हम से है ।

                 तुझसे हम नहीं तू हम से है ।।"

Comments

  1. बिलकुल सही कहा हें | जनता चाहती हें की, सरकार को आपणा कर्तव्य करना चाहीये ना की मनमानी | खैर जब सबको पता चलेगा को इस्तेहार की आड में, जगमगाहत के पीचे, मधुर शब्द और दिखाकार सपने क्या चल रहा हें , तब ही जनता जवाब देगी | देर से ही सही पर, जाब जागेगी तब देगी |

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  2. बिलकुल सही।perfect ।

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