नेहरू जी : आधुनिक भारत के प्रारंभिक पदचिन्ह
15 august 1947, एक देश आजाद हुआ, एक सपना पूरा हुआ, बूढ़ी और कई जवान आंखे जब कारागार के अंधेरे में विलीन हो गई, तब जाके कई लाख कोरी आंखो को सपने देखने की अनुमति मिली। वैसे तो भारत सभ्यता के शैशव काल से ही समृद्ध था किंतु हजारों सालों की दासता की धूल हटाते हटाते हमारा इतिहास कहीं खो गया था, और हम एक कोरे राष्ट्र के रूप में उस आधी रात को खड़े थे। उस समय भारत के इतर हम विश्व की और देखे तो पूरा विश्व दो धड़े में बंटा था। एक उन की सरकार जो पूंजी को महत्व देते थे और एक वो जो समाज को देखता था । तो हमारे जो राष्ट्र के निर्णय लेने वालें थे बड़ी दुविधा में थे क्योंकि हमारे पास मुंबई और गुजरात थी तो कोलकाता और विहार भी अब बड़ी समस्या की अगर मुंबई संभालते तो कोलकाता लूट रहा था और कोलकाता संभालते तो बंबई । फिर हमने निकाला दिल्ली का रास्ता, ना मुंबई ना कोलकाता, तो हमारी ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमे पूंजी की बात थी किंतु समाज को पीछे नही छोड़ा था इसी समावेशी अर्थव्यवस्था देने वाले हमारे पहले प्रधानमंत्री चाचा नेहरू जी के बारे में आजकल बहुत कुछ कहा जा रहा है, लेकिन आज जब भारत में पूंजीवाद भारी है एवम अतिराष्ट्रवाद की आंधी है तब भले उनके पंचशील सिद्धांत एवम समाजवादी सोच पर प्रश्न उठाए जाते हो मगर एक शैशव भारत को उस समय जब उसके सामने या तो पाकिस्तान हो जाने या इंग्लैंड और अन्य देश जैसा हो जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था उस समय एक अलग सफर पर ले जाना और भारत के लिए अपनी एक नई राह बनाना तय किया। हां वो खुद की इमेज को Larger Than Country समझते थे जिसका खामियाजा हम आजतक कश्मीर में अलगवाद, चीन का दंश झेल रहे है लेकिन देश को एक सशक्त समाज, सुनहरे भविष्य की नीव, इसरो एवम अन्य बेहतरीन संस्थानों की नीव के साथ शानदार शुरुआत देने के लिए देश हमेशा याद रखेगा । भविष्य हमेशा भूतकाल का मूल्यांकन करता है लेकिन मूल्यांकन के समय ये नही भूलना चाहिए कि उस समय की परिस्थिति क्या थी। कैसी तात्कालिक स्थितियां थी जिनमें ये निर्णय लिए गए थे । इस आलेख के अंत में इतना ही कहूंगा की जवाहर लाल नेहरू जी भले खुद की larger than the nation छवि के नीचे दबे, चीन युद्ध में हार से बुरी तरह टूटे, कश्मीर में शांति बहाली के लिए किए गए समझोतो से आहत होते हुए भी देश को एक नई राह दी जिस पर चलकर आज मेरा भारत विश्व में अपना एक मुकाम रखता है। भारतीय समाज एवम राजनीति पर उनके जो पद चिन्ह बने है उन्हे अतिराष्ट्रवाद की आंधी मिटा नही सकती । आप नेहरू के नाम को मिटा सकते हो पर उनके विचारों को, आधुनिक भारत के शैशव काल के प्रारंभिक पदचिन्ह को मिटाना असंभव है ।
------ Sooraj Garg ------
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